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कांग्रेस अपने अंत की ओर

#congress_mukt_bharat

​डरे – डरे से राहुल और सहमी – सहमी सी कांग्रेस

कार्यकर्ताओं के टूटते मनोबल और चुनाव में लगातार मिल रही हार ने कांग्रेस और उसके नेता बुरी तरह परेशान है। हालात सुधारने के लिए मंथन किया जा रहा है। लेकिन पहली कोशिश ही फेल हो गई।

कांग्रेस अध्य़क्ष सोनिया गांधी ने सांसदों से मिलने के लिए भोज का आयोजन किया। सबको न्यौता दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने 44 लोकसभा और 59 राज्यसभा सांसदों के लिए पहुंचने की सुविधा का भी खयाल रखा और संसद परिसर में ही इस रात्रि भोज का आयोजन किया। लेकिन फिर भी कुल 103 में से सिर्फ 60 सांसद ही सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे। 43 आए ही नहीं और न ही न आने की कोई सूचना तक दी।

जो कांग्रेसी कभी सोनिया गांधी के निवास 10 जनपथ के बाहर घंटों कतार लगाकर अपने नेता की एक झलक पाने के लिए बेताब रहते थे, उनका व्यक्तिगत निमंत्रण पर भी न पहुंचना कांग्रेस को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है।

शर्म से बचने के लिए कांग्रेस की तरफ से बहाना यह बनाया गया कि मोतीलाल वोरा की तबियत खराब हो गई थी, सो सांसद वहां चले गए थे। लेकिन देश बेवकूफ नहीं है, वह सब समझता है।

मोतीलाल वोरा कोई गांधी परिवार के बुलावे के सामने इतने महत्वपूर्ण है कि सांसद राहुल गांधी और सोनिया की उपेक्षा करके उन्हें देखने चले जाएं। फिर ऐसे बहानों से अब बचाव की कोशिशें उल्टे कांग्रेस की भद्द ही पिटवा रहे है। हालात खराब है और सुधरने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है।

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सोशल मीडिया की ताकत

#socialmedia

​हम जैसे लोगो ने जो सोशल मीडिया पकड़ी है न,

उसी की बदौलत आज सोनू निगम आजान को बंद करने की वकालत कर रहा है।

योगेश्वर गोली मारने को बोल रहा है।

फोगाट बहने जीप के नीचे भी पत्थरबाजों को बाँधने की वकालत कर रहीं है।

सोनू निगम ने साफ़ बोला गुंडागर्दी है बस, जब मोहम्मद इस्लाम लेके आये थे तो लाउडस्पीकर था क्या ?

सहवाग सीधे कम्युनिस्टों की ले रहा है।

अब गौतम गंभीर भी बोलने लगा कश्मीर हमारा है।

जिसको नही पसन्द, अपने पसन्द की जगह चुन लो, ये लोग जानते हैं, भारत की हरामी मीडिया इनके साथ कभी नही आएगी।

ये हमारी आप की मेहनत का नतीजा है फेसबुक और ट्विटर पर जो इनको बोलने की ताकत दे रहा हमें और मेहनत करनी है एक बड़ा बदलाव सोशल मीडिया ला रहा है।

वो मस्जिद पर जाकर इकट्ठे हैं तुम फेसबुक से इकट्ठे हो सकते हो, इसी फ़ेसबुकिया भीड़ को हमने कई जगह जमीन पर उतारा है।

मात्र एक व्यक्ति भी मेरी पोस्ट पढ़ कर संतुष्टि प्राप्त करता है, उसे अच्छा लगता है, उसके विचारों में परिवर्तन होता है।

तो भी मेरा समय ख़राब नही गया, बस ऐसे ही सोशल मीडिया का प्रयोग कीजिये।

हम एक दिन जमीन पर उतरेंगे और आकाश घेर लेंगे ।।

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अज़ान:-ध्वनि प्रदूषण का नहीं अस्तित्व का मुद्दा


ध्वनि प्रदूषण पर बहस बाद में कर लेंगे

अभी यह सिर्फ और सिर्फ भारत के अस्तित्व का मुद्दा है.

हमें समस्या लाउड स्पीकर से है, शोर गुल से है

पर वह एक अलग समस्या है

फिलहाल हमें अज़ान से और सिर्फ अज़ान से समस्या है

खूंखार मज़हब की उस खौफनाक पुकार से समस्या है जो जिहादियों को इकट्ठा करने के लिए और काफिरों के खिलाफ मोर्चाबंद होने के लिए दी जाती है समस्या उस विषबेल से है जो हमारे सेक्युलर तंत्र का फायदा उठा कर फल फूल रही है

यह विषबेल रहेगी तो यह पेड़ नहीं रहेगा, यह समझने की जरूरत है.

विषय से भटकिये मत,

मुद्दे को भटकाइये मत.

अपने अस्तित्व के प्रश्न को मात्र ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा मत बनाइये

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KASHMIR ME HINSA KE KARAN

​पाकिस्तान भारत के 4 राज्यों को छूता है, गुजरात, पंजाब, राजस्थान और जम्मू कश्मीर । मगर जो हिंसा कश्मीर होती है वो और कही नहीं होती है ।इन चारों राज्यों में केवल जम्मू कश्मीर राज्य का कश्मीर प्रान्त ही है, जहाँ मुस्लिम आबादी 68 फीसदी से ज्यादा है ! बाकि गुजरात राजस्थान और पंजाब और जम्मू कश्मीर का जम्मू प्रान्त, कही भी 10 फीसदी नहीं है।

और सबसे बड़ी बात यह कि इन तीनों राज्यों और जम्मू प्रान्त में सेना की भी आवश्यकता नहीं पड़ती । सेना की आवश्यकता पड़ती है तो केवल कश्मीर प्रान्त में, जहाँ ये 68 फीसदी पहुँच चुके है ।

यही मुख्य कारण है कि जहाँ ये मुस्लिम 20 फीसदी के आसपास पहुंचे समझो उस राज्य का बेड़ा गर्क होना तय है।

उदाहरण के तौर पर आप पश्चिम बंगाल, केरल, असम, लक्ष्यद्वीप देख सकते है। जहाँ पर आये दिन हिंसा भड़की रहती है,

इससे बड़ी कोई सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि कौन देशभक्त है, और कौन देशद्रोही ।

भारत सरकार को चाहिए अब कि जनसंख्या की, एक घिनौने षड्यंत्र के अधीन, अंधाधुन्ध वृद्धि पर रोक लगाने के लिए एक विधेयक पास करके भारत का बेड़ा गर्क होने से बचा ले !

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SADBHAVNA ACT :- congress ki ek chaal

#congress_mukt_bharat

क्या आप जानते हैं कि यूपीए सरकार ने किस तरह से एक एक्ट के जरिये सेना के हाथ को बांध दिया है ?नही ? तो पढ़िए ये और सोचिए कि हमारी सेना क्या सच मे इतनी कमजोर है ??……

2010 में मनमोहन सरकार ने आतंकवादियों के हितों ( याद रखिये आतंकवादी का हित) को संज्ञान में लेते हुए कश्मीर में # सदभावना_एक्ट लगाई जिसमें कुछ ऐसे पहलू को शामिल किया गया है जिसके अनुसार हमारे फौजियो को गुनाहगार बनाना आसान हो गया—

1–जब तक आंतकवादी फायर न करे तब तक फायर नहीं करना है। ( मतलब फायर के अलावा कुछ भी करे, पत्थर फेंके थप्पड़ मारे डंडे मारे मगर फोर्स चुपचाप पिटती रहे अपने हाथ पैर को बांधके, जैसा कि हमेशा पत्थर फेंकने की घटना सामने आती है और अभी जल्द ही एक वीडियो में देखा गया था कि सेना चुपचाप है और कश्मीरी लड़के सेना को थप्पड़ और पैर मार रहे )…

2– मारे गए आंतकवादी के पास हथियार होंना जरूरी है,और हथियार हो भी तो भी सैनिक तब तक फायर नही कर सकता जब तक कि आतंकवादी फायर न करे

( मतलब सेना आतंकवादी के फायर करने का वेट करे और अगर आतंकवादी मारा जाता है और मरने के बाद कोई उसका हितैषी हथियार छुपा दे तो उसे आतंकवादी घोषित न करके सीधा सादा कश्मीरी जवान घोषित किया जा सकता है और सैनिकों के ऊपर केस किया जा सकता है, और ये बात सबको पता है कि कश्मीर की लोकल पुलिस भी आतंकवादियों से मिली होती है तो हथियार छुपाना कोई मुश्किल नही होगा)…

3–मारे गए आतंकवादी के परिजनों को स्थानीय अदालत ( ज्ञातव्य हो कि कश्मीर के स्थानीय अदालत जहाँ सेना बेगानी ही होती है )में ये साबित करना होगा की जो मारा गया वो आतंकवादी ही है और उसके पक्ष में आतंकवादी के परिजन कोर्ट में सेना के खिलाफ रिट कर सकते है और अगर आतंकवादी आतंकवादी साबित न हुआ तो सेना के (उसको मारने वाले) जवानो पर कत्ल का केस चलता है ( मतलब की एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा हुआ साबित हो हमारे सैनिक के लिए, आतंकवादी मारने पर प्रोत्साहन कम सज़ा ज्यादा मिले तो कौन सी सेना एनकाउंटर करना चाहेगी ? और अगर एनकाउंटर किया तो प्रूफ रखे, यानि की एनकाउंटर बाद में पहले कैमरा आन करके रिकार्डिंग करे जबकि एनकाउंटर तो तुरन्त का लिया गया एक्शन होता है )…….

2010 के इस एक्ट से आंतकवादी बहुत सेफ हो गए है और सबको पता है कि ये लोग बच्चों को 500 रुपया देते है पत्थर मारने का…

आंतकवादियों के बच्चों की मुफ़्त पढाई और उसकी अगर 3/4 बीबियाँ है तो तीनो को पेंशन दिया जाता है और ये मन मोहन सिंह की सरकार का किया धरा है जो सेना के साथ आज की सरकार भी भुगत रही है…

ये कांग्रेस के खोदे हुए गड्ढे है जिसका भुगतान हमारी सेना को करना पड़ रहा है…. एक तो 370, उस पर मामला यू एन ओ में , ऊपर से # सदभावना के नाम पर आंतकवादियो की सुरक्षा …मोनी बाबा या सोनिया या और कांग्रेसी क्या सोच रखते थे ये सोच लो आप लोग ..

आज की मौजूदा सरकार अगर # सद्भावना_एक्ट खत्म करें तो किस बिना पर ?अगर एक्ट खत्म किया तो यही लोग चिल्लाएगे कि कश्मीरी अल्पसँख्यको पर जुल्म हो रहा है चाहे भले ही वहां के हिन्दुओ के साथ सेना के साथ सौतेला रवैया अपनाया जाए पर अल्पसंख्यको के नाम पर आतंकवादियो को खरोंच तक न आना चाहिए…

छोटे छोटे बच्चे तक पत्थरो का इस्तेमाल करते हैं जो जग जाहिर है और औरते फौज के सामने खुद अपने कपड़े फाड़कर इल्जाम लगाने से भी नही चूकती हैं ये बात उसी को पता है जो वहां उन परिस्थितियों से रोज 2/4 होता हो …

गोली का जवाब तो गोली दे सकते है मगर आँतकवादी मारने की कार्यवाई करने पर अदालत से बचने के लिए और अपनी सेफ्टी की खातिर फौज वीडियो बनाती है…..

आंतकवादियो के परिजनों को पेंशन मिलती है जो की एमजीआर पेंशन के नाम से नहीं

# सदभावना_पुनर्वास_सहायता के नाम से है और ये राशि 7500₹ होती है …. अब नाम भी इस तरह का दे दिया है की लोग उसके खिलाफ बोल भी न पाएं और आतंकवादियों को इसी तरह फलित किया जाए जिससे कश्मीर में सेना का मनोबल न बढ़े और हिंदूवादी सोच भी पनपने न पाए

अब आप बताओ की ऐसे में किसको दोष दिया जाय या आप अगर मोदी की जगह होते तो क्या कर पाते ??

इन सबको सुधारने में वक्त लगेगा और तब तक सुधार नही हो सकता जब तक कि लोगो का माइंड सेट न हो जाता ।। वैसे भी एक मोदी को रोकने के लिए सब चोर डाकू एक जो जाते हैं और हम जनता आंख मूदकर उनपर विश्वास कर लेते हैं।।।।

# नोट– आपको बता दें कि ये व्यथा हमारे एक फौजी भाई ने मुझे बताया,और मुझसे ये लिखने को कहा तो मैंने उन्ही तथ्यों पर ये लिखा है जिसको यहां पोस्ट करने से पहले उनको दिखाया …उनके खिलाफ एक्शन न हो इसलिए मैं उसका नाम ओपन नही कर सकता।

और जो लोग लिंक की उम्मीद कर रहे हैं तो उनसे सिर्फ एक ही सवाल करूँगा की आपके घर मे क्या क्या हो रहा है ये आप ही जानोगे, पड़ोसी वही जानेगा जो आप बताओगे।।।

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अवसरवादिता के प्रतीक केजरीवाल!


अपने स्वार्थ हेतु, महत्वाकांक्षा हेतु, प्रतिष्ठा हेतु, राजनीति बयानों की ओट में नेतृत्व झूठा श्रेय लेता रहे और भीड़ भी आरती उतारती रहे- यह राजनीतिक अवसरवादिता है। इसी अवसरवादिता के प्रतीक है अरविन्द केजरीवाल। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और ईमानदारी की दुहाई देकर दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई ‘आप’ की लगातार छीजती छवि की एक और घटना से न केवल केजरीवाल की साख को बट्टा लगा है बल्कि आम आदमी पार्टी के सितारे भी गर्दिश में जाते हुए दिखाई दे रहे हैं।

निजी मुकदमे का खर्च सरकारी खजाने से भुगतान कराने की कोशिशों का पर्दाफाश होने पर आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की एक बार फिर जमकर जगहंसाई हुई है। मानहानि के इस मुकद्दमे का सामना कर रहे केजरीवाल के वकील राम जेठमलानी के बिल का भुगतान दिल्ली सरकार के खजाने से किए जाने पर यह घमासान मच गया है। भाजपा ने इसे जनता के पैसे पर डाका करार दिया है। निश्चित ही यह राजनीतिक अधिकारों का दुरुपयोग है। सत्ता और सम्पदा के शीर्ष पर बैठकर इस तरह लोकतंत्र के मूल्यों सेे खिलवाड़ करना न केवल राजनीति को दूषित करता है बल्कि भारत की चेतना भी इस तरह की घटनाओं से प्रदूषित होती है। सत्ता के गलियारों में स्वार्थों की धमाचैकड़ी एवं मूल्यों की अवमानना चिन्ताजनक है। सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और ईमानदारी की दुहाई देने वाले एवं राजनीतिक शुचिता के महात्मा कहलाने वाले लोग इस तरह राजनीतिक मूल्यों का अपहरण करके लम्बे समय तक जनता को गुमराह नहीं कर सकते। सत्ता और स्वार्थ के कारण केजरीवाल ने अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्णता देने के लिये जिस तरह की नैतिक कायरता का प्रदर्शन किया है, निश्चित ही इससे उनकी राजनीतिक साख गिरी है। हालांकि पार्टी के नेता इस मामले में कई तरह की तकनीकी दलीलें लेकर सामने आए हैं, लेकिन ये दलीलें बेबुनियाद सिद्ध हो रही हैं। सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, नीयत का भी है। और यहां तो नियत में खोट साफ-साफ झलक रही है, उपराज्यपाल को अंधेरे में रख कर भुगतान कराने की कोशिश पूरी तरह से की गयी मगर कामयाबी नहीं मिली।

गौरतलब है कि केजरीवाल ने भाजपा नेता और केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली पर दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष रहने के दौरान घपला करने का आरोप लगाया था। जेटली ने इसे अपनी मानहानि मानते हुए अदालत में दस करोड़ रुपए हर्जाने का मुकदमा दायर कर रखा है। केजरीवाल की तरफ से मशहूर वकील राम जेठमलानी पैरवी कर रहे हैं। हुआ यों कि जेठमलानी ने अपनी फीस वसूली के लिए दिसंबर 2016 में करीब 3.8 करोड़ रुपए का बिल केजरीवाल के पास भेजा था, जिसमें एक करोड़ रुपए रिटेनर फीस तथा 22 लाख रुपए प्रति सुनवाई का जिक्र था। विवाद का बिंदु यही बिल है। इस बिल के भुगतान के संबंध में दिल्ली सरकार के विधि मंत्रालय ने अपनी सलाह में कहा कि इस पर केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय और उपराज्यपाल की मंजूरी जरूरी है। इस तरह की तकनीकी व्यवस्था के चलते ही यह घपला सामने आ सका। बहरहाल, उपराज्यपाल ने कानूनी राय ली तो इसमें यह बात साफ हुई कि यह मुकदमा ‘व्यक्ति’ पर हुआ है, न कि ‘मुख्यमंत्री’ पर। मंगलवार को जैसे ही यह मामला मीडिया में उछला तो प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। केजरीवाल पर सार्वजनिक धन की ‘लूट और डकैती’ करने के आरोप लगे हैं। सवाल सामने आया है कि निजी मामले में भुगतान करदाताओं के धन से कैसे किया जा सकता है? जबकि आम आदमी पार्टी ने अपने बचाव में कहा है केजरीवाल ने जो भी आरोप लगाए थे, वह सार्वजनिक हित में और सार्वजनिक पद पर रहते हुए लगाए थे।

अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन की उपज हैं। एक तरह से वे राजनीति में ईमानदारी के हीरो के रूप में ही आये थे और जनता ने इसीलिये उनका प्रचण्ड समर्थन किया। लेकिन उनकी कथनी और करनी में अन्तर तो सत्ता के शीर्ष पर बैठते ही झलकने लगा। जिस सीढ़ी यानी अन्ना को आधार बनाकर उन्होंने सत्ता हासिल की, उन्हीं अन्ना को ही उन्होंने प्रारंभ में ही नकारा। उनकी तो शुरुआत ही झूठ की बुनियाद पर ही हुई है। सबसे पहले तो उन्होंने राजनीति में नहीं आने की कसम खाई थी। लेकिन, बाद में वह अपनी बात से पलट गए और राजनीति में ईमानदारी और नैतिकता के नये पैमाने तय करने के लिए आम आदमी पार्टी बनाकर मैदान में आ गए। अब तक के उनके राजनीतिक करियर को देखकर सामान्य आदमी भी बता सकता है कि केजरीवाल ने राजनीति में शुचिता की कोई नई लकीर नहीं खींची है। बल्कि, उन्होंने एक अजीब किस्म की राजनीति को जन्म दिया है। अपने अपराध पर पर्दा डालने के लिए वह खुद को पीड़ित बताते हुए दूसरों पर हमलावर हो जाते हैं। उनके स्वयं के मंत्रिमण्डल एवं पार्टी के नेताओं-मंत्रियों पर चारित्रिक, आपराधिक और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं, लेकिन उन्होंने ठोस संदेश देने वाली कोई कार्रवाई नहीं की। केजरीवाल के भरोसेमंद और दिल्ली सरकार के परिवहन मंत्री गोपाल राय पर भी भ्रष्टाचार का आरोप लगा है। हालांकि उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन इस्तीफे का कारण बनाया है बीमारी को। बात केवल गोपाल राय की नहीं बल्कि उनके मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्य ऐसे ही आरोपों से घिरे हैं।

अब जबकि ये पूरा विवाद आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की छवि को धक्का पहुंचाने लगा है तो राम जेठमलानी कह रहे हैं कि वो दिल्ली के मुख्यमंत्री से बतौर फीस एक पैसा भी नहीं मांगेंगे। क्योंकि वे केजरीवाल को गरीब मानते हैं। जबकि उन्होंने 3.42 करोड़ की फीस की राशि का बिल दे दिया है। लेकिन यहां सवाल खड़ा होता है कि अगर जेठमलानी को मुफ्त सेवा देनी थी तो इतना लंबा-चैड़ा बिल क्यों भेजा था? पिछले महीने नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी एक रिपोर्ट में 29 करोड़ रुपए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मानकों के विरुद्ध विज्ञापन पर खर्च करने की बात कही थी। इस बारे में उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को वसूली करने का आदेश भी जारी कर चुके हैं। इसके बाद अब इस नए खुलासे के चलते आप की साख को और चोट पहुंची है। आम आदमी पार्टी हाइकमान संस्कृति को खत्म करने और सत्ता के दुरुपयोग को बंद करने के वादे पर वजूद में आई थी। विडंबना यह है कि खुद अपनी ही कसौटियों पर आज वह कठघरे में खड़ी दिखती है। ये मुद्दे जहां एमसीडी चुनाव के परिप्रेक्ष्य में आम आदमी पार्टी के खिलाफ जाते हुए दिखाई दे रहे हैं वहीं केजरीवाल की सियासी महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में रोड़ा साबित होने के संकेत भी दे रहे हंै, क्योंकि केजरीवाल ने राजनीति में सियासत की धारा को बदलने का दावा कर एंट्री की थी। उनकी सियासत की ताकत पारदर्शिता और बेहतर छवि प्रस्तुत की थी, लेकिन अफसोस यह है कि केजरीवाल ने जिन उच्च नैतिक आदर्शों को अपनी सियासत का आधार बनाया था वो अब उन्हीं सिद्धांतों को लांघने में लगे हैं। वे अब किसी सामान्य राजनीतिज्ञ की तरह ही हैं जिनके चेहरे से आदर्श और सिद्धांतों को वो मुखौटा उतर चुका है जो उन्होंने अपनी सियासत चमकाने के लिए पहले पहन रखा था।

आज की राजनीति में ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है तो सत्य और ईमानदारी की रेखा से कभी दाएं या बाएं नहीं चले। जो अपने कार्य की पूर्णता के लिये छलकपट का सहारा न लें। हमारे भीतर नीति और निष्ठा के साथ गहरी जागृति की जरूरत है। नीतियां सिर्फ शब्दों में हो और निष्ठा एवं नियत पर सन्देह की परतें पड़ने लगे तो राजनीति में शुचिता और शुद्धि कैसे आएगी? बिना जागती आंखों के सुुरक्षा की साक्षी भी कैसी! एक वफादार चैकीदार अच्छा सपना देखने पर भी इसलिए मालिक द्वारा तत्काल हटा दिया जाता है कि पहरेदारी में सपनों का खयाल चोर को खुला आमंत्रण है। केजरीवालजी! ईमानदारी अभिनय करके नहीं बताई जा सकती, उसे जीना पड़ता है कथनी और करनी की समानता के स्तर तक।

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Khatme ki or ISIS

#Khatme_ki_or_ISIS

​अमरीका ने कल जो अफगानिस्तान में बम गिराया है

उसका तकनीकी नाम तो GBU 43 है पर आम बोलचाल की भाषा मे उसे MOAB कहते हैं ।

MOAB बोले तो Massive Ordnance Air Blast .

इसके अलावा MOAB को Mother Of All Bombs भी कहा जाता है ।

पर मुझे अगर हिंदी में कहना होगा तो मैं इसे सभी बमों का बाप कहूंगा ।

धरती पे अब तक जितने भी विध्वंसक बम हैं उनमें परमाणु बम के बाद दूसरा नंबर इस MOAB का ही आता है ।

इसकी खासियत ये है की ये बहुत बड़ा होता है ।

बड़ा माने बहुते बड़ा ।

मने इसका वज़न 21,600 पौंड होता है मने 9525 किलो का बम

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि किसी ने एक ट्रक अत्यंत ज्वलनशील बारूद आपके शहर के बीचों बीच फोड़ दिया हो और इसे F16 जैसे किसी लड़ाकू विमान से नही बल्कि भारी भरकम मालवाहक हर्क्यूल्स विमान से गिराया जाता है ।

गौर कीजिए इसे निशाने पे दागा नही जाता बल्कि गिराया जाता है , वो भी पैराशूट से ।

मने आसमान से मौत अचानक नही बल्कि धीरे धीरे टपकती है ।

मने आप अपनी मौत को अपनी तरफ आते देख सकते हैं

धीरे धीरे धीरे

इस बम में जो तकनीक प्रयोग में लायी जाती है की बम जब फटता है तो इससे बड़ी भयंकर आग लगती है ।

इतनी भयंकर कि वो कुछ क्षणों में अपने आसपास के वातावरण की सारी ऑक्सीजन को सोख लेती है ।

इसके शिकार धमाके से नही मरते बल्कि ऑक्सीजन की कमी से दम घुटने से और झुलस के मरते हैं ।

दूसरी बात ये कि इस से सिर्फ जान की क्षति होती है माल की नही ।

मने घर द्वार इमारतें सही सलामत रहेगी ।

सिर्फ आदमी जानवर चिड़िया पशु पक्षी कीड़े मकोड़े और सब वनस्पतियां झुलस के दम घुट के मर जाएंगी ।

ये बम 1.6km के क्षेत्र में तो कुछ ज़िंदा नही छोड़ता और आदमी तो 6 से 7 किमी के दायरे में भी नही बचते ।

शिकार इस बम से बच के भाग नही सकता ।

जाएगा कहां ?

जब ऑक्सीजन ही नही है वातावरण में ।

बताया जा रहा है कि वहां पहाड़ों की गहरी गुफाओं में IS के आतंकी अपना अड्डा बनाये थे ।

ये गुफाएं पहाड़ों के अंदर इतनी गहरी हैं कि वहां लड़ाकू विमानों से गिराए गए बम कोई काम नही करते ।

ऐसे में ये MOAB से ऑक्सीजन सुखा के आतंकियों को मारा है ट्रम्प ने ।

कुल 3500 से ज़्यादा आतंकी मारे गए है शायद ।

हालांकि अभी मरने वालों की संख्या की पुष्टि होना बाकी है ।